वर्तमान समय में मोहनदास करमचंद गांधी से मतभेद रखने वाले लोग उनकी छवि को धूमिल करने हेतु उपर्युक्त पाद प्रयोग करते हुए यह आरोप लगाते हैं कि गांधी ने जान भूझकर इस श्लोक के अग्रिम पाद का प्रयोग न करके जनता को भ्रमित किया। ऐसा कहने वाले लोग इस श्लोक के अग्रिम पाद का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं,
अहिंसा परमो धर्म:| धर्म हिंसा तथैव च ||
इतना ही नहीं, वे अपनी बात को अधिक सत्यता प्रदान करने के लिए ऐसा भी कहते हैं कि यह श्लोक महाभारत से उद्धृत है।
किन्तु यह सत्य नहीं है।
महाभारत में अहिंसा से संबन्धित मुख्यतः तीन श्लोक प्राप्त होते हैं और आज मैं उन तीनों श्लोकों का अन्वय आदि विश्लेषण आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा।
अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां स्मृतः ।
तस्मात्प्राणभृतः सर्वान्न हिंस्याद्ब्राह्मणः क्वचित् ।।
अन्वय:- अहिंसा सर्वप्राणभृतां परमो धर्मः स्मृतः। तस्मात् ब्राह्मणः सर्वान् प्राणभृतः क्वचित् न हिंस्यात्।
सरलार्थ- अहिंसा को सभी प्राणियों के लिए सर्वोच्च धर्म माना गया है इसलिए ब्राह्मण को किसी भी अवस्था में किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
प्रसंग- प्रस्तुत श्लोक महाभारत के आदिपर्व के द्वादश अध्याय का एकादश श्लोक है। इस श्लोक में डुंडुभ जाति के एक सर्प ने महात्मा रुरु के समक्ष अहिंसा का वर्णन किया है क्योंकि महात्मा रुरु प्रतिशोधवश उनकी हत्या करने जा रहे थे। महात्मा रुरु जो कि सप्तऋषियों में से एक, ज्योतिष के अनेक सिद्धांतों प्रवर्तक, विश्व के प्रथम कुलपति महर्षि शौनक के पितामह हैं, उनकी भार्या प्रमद्वरा एक सर्प के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई किन्तु महात्मा रुरु ने अपनी आधी आयु उन्हे प्रदान कर उन्हे पुनः जीवित कर दिया। प्रमद्वरा से विवाह के पश्चात उन्होने ने यह प्रतीज्ञा की कि वे सर्पों का सर्वनाश कर देंगे और इसी प्रतिज्ञा के कारण वे उस डुंडुभ सर्प को मारने जा रहे है। सर्प के अहिंसा का ज्ञान करने के पश्चात 'यह कोई बड़ा महात्मा है' ऐसा जानकर उन्होने उसे छोड़ दिया।
विशेष- महर्षि शौनक महाराज जन्मेजय को यह कथा सर्पसत्र यज्ञ के समय सुनाते हैं।
दूसरा अहिंसा से संबन्धित श्लोक हमें अनुशासनपर्व मे मिलता है-
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तप: ।
अहिंसा परम सत्यं यतो धर्म: प्रवर्तते || २३ ।।
अन्वय- अहिंसा परमः धर्मः। तथा अहिंसा परं तपः। अहिंसा परमं सत्यम्, यतः धर्मः प्रवर्तते।
सरलार्थ- अहिंसा ही परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है, और अहिंसा ही परम सत्य है; क्योंकि उसी से धर्म की प्रवृत्ति (स्थापना और संचालन) होती है।
प्रसंग- यह श्लोक महाभारत के अनुशासनपर्व के 115वें अध्याय से उद्धृत है और इस अध्याय में पितामह भीष्म युद्धोपरांत युधिष्ठिर को मांस एवं मांसभक्षण के दोषों का एवं उनके त्याग का उपदेश दे रहें हैं। इस श्लोक के पूर्ववर्ती श्लोक से एवं उत्तरवर्ती श्लोक से यह प्रसंग अधिक स्पष्ट हो जाता है।
तस्माद् विद्धि महाराज मांसस्य परिवर्जनम् |
धर्मस्यायतन श्रेष्ठ स्वर्गस्य च सुखस्य च ।। २२ ।। (पूर्ववर्ती श्लोक)
अर्थ- इसलिये महाराज! तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि मांसका परित्याग ही धर्म, स्वर्ग और सुखका सर्वोत्तम आधार है।
न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते ।
हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे ।। २४ ।। (उत्तरवर्ती श्लोक)
अर्थ- तृणसे, काठसे अथवा पत्थरसे मांस नहीं पैदा होता है, वह जीवकी हत्या करनेपर ही उपलब्ध होता है; अत: उसके खानेमें महान् दोष है।
इन दोनों श्लोकों से यह श्पष्ट हो जाता है कि अहिंसा से संबन्धित लगने वाला श्लोक असल में मांसभक्षण के त्याग के प्रसंग में प्रयुक्त है।
अहिंसा से संबधित अनुशासनपर्व में हमें एक और श्लोक प्राप्त होता है-
अहिंसा परमो धर्मो हाहिंसा परमं सुखम् |
अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ।।
अन्वय- अहिंसा परमः धर्मः। अहिंसा परमं सुखम्। अहिंसा सर्वेषु धर्मशास्त्रेषु परमं पदम् (उच्यते / स्मृता)।
सरलार्थ- अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम सुख है, और सभी धर्मशास्त्रों में अहिंसा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।
प्रसंग- यह श्लोक राजधर्म आदि विषयों को लेकर भगवान शंकर एवं माता पार्वती के मध्य हुई वार्ता का एक श्लोक है। इससे पूर्व अध्याय के श्लोकों में राजधर्म के विषय में भगवान शंकर का वचन है कि-
वध्यांश्व घातयेद् यस्तु अवध्यान् परिरक्षति ।।
अवध्या ब्राह्माणा गावो दूताश्वैव पिता तथा |
विद्यां ग्राहयते यश्न ये च पूर्वोपकारिण: ।।
स्त्रियश्वैव न हन्तव्या यश्न सर्वातिथिर्नर: ।।
अर्थ- राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य--ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।
तत पश्चात भगवान शंकर ने अहिंसा को सर्वोच्च धर्म कि उपाधि प्रदान की हैं। अर्थात् भगवान का वचन है कि यद्यपि अहिंसा सर्वोच्च धर्म है किन्तु यदि कोई आपके राज्य पर अथवा आपके धर्म पर प्रहार करे उसका वध भी आवश्यक है।
निष्कर्ष-
"अहिंसा परमो धर्म:| धर्म हिंसा तथैव च ||" यह वाक्य तो महाभारत में उद्धृत नहीं है किन्तु इस वाक्य की सत्यता को प्रकाशीत करने वाले श्लोक हमारे ग्रन्थों में अवश्य उपस्थित हैं।
और अंततः रही बात मेरी कि मैं इस वाक्य को अपने आप का एक भाग क्यों मानता हूँ क्योंकि मैं इस वाक्य कि सत्यता को जानता हूँ और साथ साथ यह भी मानता हूँ कि यह वर्तमान काल की सर्वाधिक आवश्यकता है।