छत्रपति शिवाजी महाराज की राजमुद्रा हमारी संस्कृति एवं संस्कृत साहित्य वांगमय की विशालता का एक अनूठा उदाहरण है। इस राजमुद्रा का निर्माण करने वाले स्वयं शिवराय के पिताश्री शाहजी राजे हैं। उस राजमुद्रा पर जो श्लोक अंकित है वह संस्कृत वैदिक तथा लौकिक साहित्य में अति प्रसिद्ध छंद अनुष्टुप छंद में रचित है। संस्कृत साहित्य की वैदिक शाखा में अनुष्टुप छंद का एक ही भेद प्रचलित है जो सभी वैदिक ग्रंथों में मुख्य रूप से पाया जाता है। किन्तु लौकिक साहित्य में अनुष्टुप छंद के कई भेद है।
अनुष्टुप छंद :-
यह छंद संस्कृत साहित्य में अधिकतर प्रयोग किया जाने वाला वार्णिक छंद है।इस छंद में चार पद होते हैं जिनमें प्रत्येक पद में आठ अक्षर होते हैं अर्थात् कुल 32 अक्षर होते हैं। इस छंद को पद्य अथवा श्लोक भी कहा जाता है।
छंद लक्षण-
छंदशास्त्र के अनुसार अनुष्टुप छंद के लक्षण निम्नलिखित है-
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयम् सर्वत्र लघु पञ्चमम्।
द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः।।
लक्षणार्थ- इस (अनुष्टुप) छंद के प्रत्येक पद के छठे अक्षर को गुरु अर्थात् दीर्घ जानना चाहिए और प्रत्येक पद के पाँचवें अक्षर को लघु अर्थात् हृस्व जानना चाहिए। इस छंद के दूसरे तथा चौथे पद के सांतवे अक्षर को हृस्व तथा अन्य पदों (पहले और तीसरे) के साँतवे अक्षर को दीर्घ जानना चाहिए।
यदि हम उपर्युक्त लक्षणार्थ को ध्यान करके मराठा साम्राज्य की राजमुद्रिका पर अंकित श्लोक का वाचन करते है तो हुमएन यह लक्षणार्थ सिद्ध होता दिखता है।
प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता।
शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।।
प्रथम पद का पाँचवा अक्षर- द्र (लघु)
द्वितीयपद का पाँचवा अक्षर- श्व (लघु)
तृतीयपद का पाँचवा अक्षर- शि (लघु)
चतुर्थपद का पाँचवा अक्षर- य (लघु)
प्रथमपद का छठा अक्षर- ले (दीर्घ)
द्वितीयपद का छठा अक्षर- वं (दीर्घ) (“ह्रस्वं लघु । संयोगे गुरु ॥ १।४।१०-११ ॥”)
तृतीयपद का छठा अक्षर- वस् (दीर्घ)
चतुर्थपद का छठा अक्षर- रा (दीर्घ)
प्रथमपद का सांतवा अक्षर- खे (दीर्घ)
तृतीयपद का सांतवा अक्षर- यै (दीर्घ)
द्वितीयपद का सांतवा अक्षर- दि (लघु)
चतुर्थपद का सांतवा अक्षर- ज (लघु)
इस प्रकार अनुष्टुप छंद का छंद लक्षण सिद्ध होता है।
अब हम श्लोक के अर्थ की ओर बढ़ते हैं-
श्लोक- प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता।
शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते।।
अन्वय:- प्रतिपदस्य चन्द्र लेखा इव , वर्धिष्णु विश्व वन्दिता तस्य शाहसूनोः शिवस्य एषा मुद्रा सकलभद्राय रजदिप्तो राजते।
शब्दार्थ:- प्रतिपदस्य-प्रतिपदा की; चंद्रलेखा-चन्द्रकला; इव-के समान; वर्धिष्णु-वर्धनशील अर्थात् जो स्वभाव से ही वृद्धि को प्राप्त होती हो; विश्ववंदिता-सारे विश्व में वंदनीय; तस्य-उस; शाहसूनोः-शाहजी के पुत्र की; शिवस्य-शिवाजी की; एषा-यह(समीपतर्वर्ती); मुद्रा-मुद्रिका; सकलभद्राय-सभी का शुभ करने वाली; राजदिप्तो- राज्य के दीपक के समान अर्थात् दीप्तिमान; राजते-राज करती है।
अनुवाद- प्रतिपदा के चंद्रमा के समान यह मुद्रिका स्वभाव से ही वृद्धि को प्राप्त होने वाली है तथा सकल विश्व में पूजनीय है। शाहजी भोसले के पुत्र शिवाजी की यह मुद्रिका राजमहल में दीप्तिमान होते दीपक के समान स्वराज्य में प्रकाश का विस्तार करती है एवं शिवाजी की यह मुद्रिका सकल जगत के लिए कल्याणकारी है।
विशेष- वंदिता: का मूल शब्द होगा वंदते तथा “वंदिअभिवादनस्तुव्यो:” इस कथन से इस श्लोक में प्रयोग हुए वंदिता: शब्द के दो अर्थ हुए- एक पूजनीय तथा दूसरा अभिवादनयोग्य। इस श्लोक का सम्पूर्ण अर्थ बंता है-
शिवाजी की यह राजमुद्रा सकलविश्व में पूजनीय अथवा अभिवादनयोग्य है।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जय। हिंदवी स्वराज्य की जय। जय श्री राम।