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A Journey Back to Roots: Reviewing How I Became a Hindu

Through a blend of autobiography and ideological reflection, this review analyzes a search for truth, identity, and belonging, offering insights into the intersections of faith, history, and civilizational consciousness.

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A Journey Back to Roots: Reviewing How I Became a Hindu

त्मकथाएँ साहित्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हमारी संस्कृति में जितनी उत्सुकता धर्म को जानने की,विभिन्न सभ्यताओं को जानने की है;उससे अधिक उत्सुकता यह जानने की होती है कि किसी सिद्ध अथवा सफल व्यक्ति ने स्वयं के जीवन को किस प्रकार जिया। सामान्यतः यदि हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो हमसे उम्र,ज्ञान और अनुभवों में बड़ा है तो हमारी यह कोशिश रहती है कि हम उनकी बिताई हुई जीवनशैली को अधिक से अधिक जाने। इस प्रकार की सोच का कारण यह भी हो सकता है कि जब हम किसी मनुष्य को हमारा उद्देशित जीवन व्यतीत करते हुए देखते हैं,तब हमारे भीतर यह विश्वास जन्म लेता है कि हम हमारा उद्देशित जीवन जो अभी तो काल्पनिक है;उसे वास्तविकता में परिवर्तित कर सकते हैं और साथ ही हमें यह भी स्पष्ट दिखता है कि किस प्रकार की गलतियों के क्या परिणाम हो सकते हैं ताकि परिणाम का ज्ञान होने पर हमारा चंचल चित्त वो गलतियाँ न करें।

थोड़े दिन पहले एक सिद्ध एवं सफल व्यक्ति की आत्मकथा पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनका नाम श्रीमान सीताराम गोयल जी है। 16 अक्टूबर 1921 को दिल्ली में जन्मे सीताराम जी एक पञ्जाबी परिवार से आते है। उनके घर में “संत गरीबदास” जो निर्गुण धारा के एक संत थे,के विचार प्रस्फुटित होते थे। वे जग में एक इतिहासकार,लेखक और हिन्दुत्व क विचारक के रूप में जाने जाते है। उनकी आत्मकथा का नाम “मैं हिन्दू कैसे बना” हैं।

आर्य समाजी सीताराम-

वर्षोंपरांत जैसे जैसे सीताराम जी बड़े हो रहे थे,स्वतंत्रता संग्राम अपनी पराकाष्ठा को छु रहा था। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में एक नए समाज की स्थापना हो रही थी। एक ऐसा समाज जो वेदों को, वेदमन्थन को और वैदिक रीतियों को उनकी जगह पर पुनर्स्थापित कर रहा था। समाज जो स्वयं को आर्यों का समाज कहता था और जिसके संस्थापक थे महर्षि दयानंद सरस्वती। सीताराम जी के पिताजी का सनातन इतिहास में घटित घटनाओं की कथाओं के प्रति अत्यंत खिंचाव था और यही कारण था की बचपन से ही सीताराम जी का इन कथाओं से वास्ता पड़ गया था। अब ऐसे व्यक्ति का तत्कालीन हिन्दू समाज में एक वैदिक वर्ग का संस्थापन करने वाले व्यक्ति के प्रति खिंचाव होन स्वाभाविक था।

गाँधीवादी सीताराम-

जैसे जैसे भारत का स्वतंत्रता संग्राम सफलताएँ प्राप्त कर रहा था वैसे वैसे उस संग्राम से और भी लोग जुड़ रहे थे। एक ऐसे ही व्यक्ति जिन्होंने तत्कालीन संग्राम में अहिंसा का परचम लहराया उनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। अतीत में अंग्रेजों का वकील रहने का फायदा उठाकर जब गांधीजी का परचम बुलंदियाँ छूने लगा उसी के साथ उनकी लोकप्रियता में भी चार चाँद लगने लगे। इसी कारण से सीताराम जी भी उनकी ओर आकर्षित होने लगे। परंतु उनके गांधीजी के प्रति खिंचाव का यह एकमात्र कारण नहीं था। मुख्य कारण था कि उस समय गांधीजी पिछड़ी जाति के लोग जिन्हे उन्होंने हरिजन का नाम दिया था,उनके साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़े होने लगे थे जिसका सबसे ज्यादा असर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता पर हुआ और साथ साथ सीताराम जी पर भी। गांधीजी सबके साथ साथ उनके भी आदर्श हो चले थे।

मार्क्सवादी सीताराम-

किताबे जीवन में बहुत बदलाव लाती है। आपके हाँथ जिस प्रकार की किताब लग जाएगी,आपमें उसी प्रकार के चारित्रात्मक बदलाव दिखने लगेंगे। साल था 1942। सीतारामजी की उम्र स्नातक करने की हो चली थी। दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.ए. में दाखिल लेने के साथ ही एक दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी दोस्त के रूप में उन्हे तोहफा मिला था। उस दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी ने पहले तो सीताराम जी के मस्तिष्क में घर कर चुके गाँधीवाद की सच्चाई बतलाने के लिए कुछ किताबे सुझाई। उन किताबों को पढ़कर गाँधीवाद तो पूर्णतः नहीं छूटा पर समाजवाद को जानने की इच्छा उनके मन में प्रकट हुई। परंतु वे कहाँ जानते थे कि यह जिज्ञासा पहले उन्हे मार्क्सवाद और फिर साम्यवाद के द्वार तक ले जाएगी। उनके अनुसार मार्क्सवाद को जाने बिना समाजवाद को पूर्णतः नहीं समझा जा सकता था। और फिर उन्होंने अपनी इस इच्छा के चलते काल मार्क्स की “द कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो” को पकड़ा जिसने भविष्य में उनको “दास कपितल” तक पहुंचाया। इन दो किताबों ने उनके मन में कार्ल मार्क्स के प्रति आदर और सद्भाव दोनों प्रकट कर दिए थे। वैसे मार्क्स ने उन्हे साम्यवाद के अलावा और भी बहुत कुछ दिया था। मार्क्स को समझने के लिए उन्होंने कई सारे पाश्चात्य एवं भारतीय दार्शनिकों का सहारा लिया जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- प्लेटो,सोक्रेटस,श्री ओरोबिंदों,बर्नार्ड शॉ और आल्डस हक्सले। हम एक प्रकार से कह सकते हैं कि उन्होंने इस दौरान अपने दार्शनिक ज्ञान का सर्वाधिक विकास किया।

साम्यवादी सीताराम-

वक्त था 1945–46। सीताराम जी का स्नातक पूरा हो चुका था। और साथ ही उनका मार्क्सवाद से साम्यवाद तक का सफर भी। जब वे नौकरी की तलाश में थे उस समय उनकी भेट उनके कॉलेज के अग्रज से हुई जिनका नाम राम स्वरूप था। राम स्वरूप जी ने उनके मस्तिष्क की हालत को परखा और फिर उन्हे समझाने का भी प्रयास किया की वे जीवन के गलत रास्ते पर अग्रसर हो चले हैं किन्तु साम्यवाद में अंधे हो चले सीताराम जी को उनकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान कलकत्ता में नौकरी करते हुए सीताराम जी साम्यवादी पार्टियों के संपर्क में आ चुके थे और उनके लिए कार्यरत थे। उन्होंने उस दौरान साम्यवादी पार्टियों के यहाँ सम्पादन का कार्य भी किया था। उनके सारे लेख साम्यवाद की ओर उनका आकर्षण स्पष्ट दर्शाते थे और अनजाने में वे इन दलदल में गहरा फसते जा रहे थे। किन्तु उसी समय कुछ ऐसा घटित हुआ जिससे प्रभावित होकर वे धीरे धीरे साम्यवाद के दलदल से बाहर निकालने लगे थे। कलकत्ता में सुहारावर्दी और जिन्ना का तैयार किया हुआ “डियरेक्ट एक्शन डे” असर करने लगा था और कलकत्ता के प्रमुख साम्यवादी उनकी पाकिस्तान की मांग का समर्थन कर रहे थे। ये घटना सीताराम जी के साम्यवादी दौर के अंत का आरंभ थी। इस घटना के बाद उन्हे साम्यवाद से दूसरा झटका तब लगा जब कलकत्ता के किसी भी साम्यवादी ने नोआखली में हुए हिंदुओं के नरसंहार का किसी प्रकार से विरोध नहीं किया। इस घटना के बाद उन्हे यह समझ में आने लगा था कि साम्यवाद कुछ और नहीं बल्कि हिंदुओं के प्रति नफरत का नया तरीका है और साम्यवादियों में किसी प्रकार की कोई संवेदनशीलता नहीं बची है। इस विचार ने उन्हे विचलित कर दिया था। सीताराम जी का कहना है कि मार्क्सवाद और साम्यवाद में बहुत अंतर है। मार्क्स के लिखे विचारों की मानना और उनके बताए पथ पर चलना मार्क्सवाद कहलाता है किन्तु साम्यवाद का मार्क्स से कोई लेना देना नहीं है। मार्क्स को छोड़ जो रास्ता लेनिन और स्टालिन दिखाते है या दूसरे शब्दों में कहें की रूस की बनाई और बताई हर नीति और बात का अक्षरसह पालन करना साम्यवाद कहलाता है। आजादी के बंटवारे के समय घटी घटनाओं पर साम्यवाद की राय देख उन्हे साम्यवाद से घृणा हो चली थी और वे अंदर से विचलित होने लगे थे। अब उन्हे एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जो कि अपना समग्र ज्ञान के एक धक्के से उन्हे साम्यवाद से बाहर धकेल दे।

सनातनी सीताराम-

जिस ज्ञान के धक्के की आवश्यकता सीताराम जी को थी वह उन्हे माननीय राम स्वरूप जी के रूप में मिला। आजादी के वर्षों के दौरान स्वरूप जी गोयल जी के पास कुछ दिनों के लिए कलकत्ता आ गए थे और इन कुछ दिनों में स्वरूप जी ने सीताराम जी को साम्यवाद के पूर्ण सत्य से परिचित कराया। और साथ ही उनके जो बॉस थे जो स्वयं भी सीताराम जी की भांति साम्यवाद के प्रचारक थे,उन्हे भी इस सत्य से अवगत कराया। जब सीताराम जी ने यह समझा कि साम्यवाद की समग्र विचारधाराएँ भारत की पुण्यभूमि और इस पुण्यभूमि पर निवास करने वाले बुद्धिजीवियों के लिए कितनी घातक है; सर्वप्रथम उन्होंने स्वयं को इससे मुक्त किया और फिर यह तय किया कि इसका असर वे समाज पर नहीं होने देंगे। उन्होंने स्वयं को साम्यवाद विरोधी कार्यों में संलग्न कर लिया। कुछ समय पश्चात तबीयत खराब होने के कारण उन्हे दिल्ली लौटना पड़ा। जब वे वर्षों के बाद अपनी जन्मभूमि पर लौटे तब तक वे पुनः एक हिंदुत्ववादी का रूप ले चुके थे। कुछ पारिवारिक परिस्थितियों के चलते उन्होंने कुछ वर्षों के लिए लेखन कार्य से अवकाश लिया और फिर करीब 15 वर्षों के बाद जब वे अपनी कलम की ओर वापिस लौटे तब उन्होंने जन्म दिया “वॉयस ऑफ इंडिया” प्रकाशन को जो तब से आज तक हिन्दू राष्ट्रवाद के विचारों का साथी है।

उपसंहार-

सीताराम जी की जीवनी को पढ़कर यह समझ में आता है की व्यक्ति को सदैव ऐसी विचारधारा की ओर आकर्षित होना चाहिए जो राष्ट्र के हित में हो और ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जिससे वह राष्ट्र की उन्नति में किसी न किसी प्रकार से भागी बने। सीताराम जी की कहानी हमें यह भी समझाती है की यदि एक दिशाहीन व्यक्ति अपनी सोच को विकसित और व्यापक बनाने हेतु ज्ञानार्जन करता भी है तो उसे कुछ फायदा नहीं होगा क्योंकि एक दिशाहीन व्यक्ति यह नहीं जानता की उसे क्या पढ़ना है और क्या नहीं।किस विचारधारा को मानना है और किस को नहीं। एक ऐसी सोच का निर्माण करना जो कि शास्त्र सम्मत भी हो और राष्ट्र का हित करने वाली भी हो, यही बुद्धिजीवियों का का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य है। साथ ही साथ सीताराम जी की जीवनी हमें यह भी सिखाती है कि जब तक हम एक ही प्रकार की विचारधारा को पढ़ते रहेंगे तब तक हमारी सोच व्यापक नहीं होगी। हमें अपनी सोच को व्यापक करने हेतु सभी विचारधाराओं का गहराई से अध्ययन करना चाहिए ताकि हम ये फैसला कर सकें कि वर्तमान की सभी विचारधाराओं में कौनसी विचारधारा है जो राष्ट्र का हित करनेवाली और शास्त्र सम्मत है। यदि किसी समाज में वर्तमान में ऐसी कोई विचारधारा ही नहीं है तो यह भी हम विद्वानों का धर्म है कि उस समाज में एक ऐसी विचारधारा का निर्माण करें। एक अंतिम बात जो सीताराम जी की जीवनी हमें सिखाती है कि हम चाहें कितनी भी विचारधाराओं और विदुषी वाणियों का अध्ययन कर लें, परंतु हमें अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक जड़ों को सशक्त रख चाहिए ताकि जब कभी भी जीवन में लौटने का समय आए तो हम सकुशल स्वयं की जड़ों की ओर लौट सकें।

विशेष-

अपनी इस जीवनी में सीताराम जी ने यह भी बताया है कि किस प्रकार ईसाई मिशनरी दिशाहीन और अनभिज्ञ लोगों का धर्म परिवर्तन करती है। सीताराम जी द्वारा लिखे गए अनुभवों के अनुसार ईसाई मिशनरी एक ऐसे समय का उपयोग करके आपके पास आती हैं जब आप बाह्य परिस्थितियों के कारण अंदर से टूट रहे होते हो अथवा टूट चुके होते हो। जब आपको जीवन में रोशनी आने का एक भी रास्ता दिखाई नहीं पड़ता और सब ओर तमस ही तमस दिखाई पड़ती है,उस व्यक्त चर्च का फादर आकर आपको यह बात समझाता है जीजस ही आपके जीवन की एकमात्र उम्मीद हैं,वही आपके भविष्य का रास्ता है। वे ये भी समझाते है कि यदि आप जीजस की शरण में जाओगे तभी आप ठीक हो सकते हो अन्यथा आपकी अवस्था में कोई सुधार नहीं होगा। इतना ही नहीं ये फादर आपको आर्थिक रूप से,मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से सहायता करता है और फिर जब आप ठीक होने लगते हो तब वह आपको एक कमरे में ले जाता हैं और यह निर्देश देता है की अगले 10–11 दिन आपको न किसी से बोलना है और न ही किसी से मिलना है; बस जीजस का ध्यान करना है और जीजस से प्रार्थना करनी है की वो आपको अपनी शरण में ले। इसके अलावा फादर के प्रवचनों को सुनना हैं। और अंततः जब आप यह सब पार कर लेते हो तब वही फादर आपसे गोमांस खाने और शराब का सेवन करने का आदेश देता है और बताता है की बिना गौमान्स का सेवन किए आप सच्चे ईसाई नहीं कहलाओगे।

अंततः निर्णय आपका है कि आप राष्ट्र की उन्नति हेतु संकल्पित होन चाहते हैं अथवा ऐसे पंथों में फँसकर स्वयं को बर्बाद करना चाहते हैं। इसी के साथ मैं ये लेख आप सभी को समर्पित करता हूँ।

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