मैं पहले ही इस लेख के पाठकों को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि इस लेख कि सम्पूर्ण सामाग्री कुमार विश्वास जी और शुभांकर मिश्रा जी के मध्य हुई बातचीत पर और साथ ही प्रखर श्रीवास्तव जी की किताब “हे राम” के द्वारा उपलब्ध जानकारी पर आधारित है।
शुभांकर मिश्रा जी ने इस बातचीत को तीन हिस्सों में बांटा है — सियासत,धर्म और प्रेरणादायक बातचीत। मैं सनातन धर्म पर हुई चर्चाओं के विषय मे कोई टिप्पणी नहीं करूंगा क्योकि मेरे ज्ञान के और कुमार जी के ज्ञान के स्तर मे अधिक अंतर है किन्तु मैं इस लेख मे उनके राजनीतिक बयानो और मुख्य तौर पर उनके गांधी और नेहरू प्रेम पर टिप्पणीपूर्वक प्रकाश डालूँगा।
सर्वप्रथम चर्चा के प्रारंभ मे दुर्योधन और शकुनि पर चर्चा करते हुए वे बोले- “मेरे साथ जो दुर्योधन थे उनका दोष नहीं है,उन्हे बनाने वाले शकुनियों, जिनमे से कुछ आपके पेशे (प्रत्रकारिता) से भी थे उनका दोष है।”
यदि आप इस कथन को पूर्णतः सत्य मानते है तो फिर आप प्रत्येक साक्षात्कार मे मात्र दुर्योधनों का अर्थात आंदोलन के समय जुड़े आपके उन मित्रों के विश्वासघात का ही वर्णन क्यों करते है? यदि आपके अनुसार शकुनि दोषी है तो आप उन शकुनियों का नाम लीजिये अथवा उन्हे लज्जित कीजिये। किन्तु आप ऐसा नहीं करते क्योकि यह आप भी जानते है की शकुनि तो मात्र अपने स्वभाव का पालन कर रहा था किन्तु दुर्योधन ये जानते थे कि वे अधर्म कर रहे है किन्तु उसके पश्चात भी मात्र सत्ता कि लालसा हेतु उन्होने वह सब कुछ किया जो उन्हे नहीं करना चाहिए था। और इसलिए दुर्योधन अपने विवेक का प्रयोग न करने का दोषी है और शकुनि दोषी नहीं है।
अब प्रारंभ करते है आपका नेहरू और गाँधी प्रेम-
सबसे पहले तो आपने माहाभारत का अध्ययन किया है और इसलिए आपको यह भली भांति ज्ञात होगा कि चीरहरण पर भीष्म पितामह के चुप रहने के पश्चात भी विदुर ने चुप्पी न साधने का निश्चय किया और कुल के सभी बड़ों के उस सभा मे उपस्थित होते हुए भी उन्होने वहाँ हो रहे उस कृत्य एवं मुक दर्शक बने हुए सभी को खरी सुनाई। यह घटना जानने के पश्चात भी आप इतिहास मे घटित हुए अधार्मिक और अनैतिक प्रसंगो पर बोलने से कतराते हैं! जब भी आपसे नेहरू अथवा गाँधी के गलत कर्मों पर सवाल किया जाता है तो आप उसे कुल का सबसे छोटा होने कि दुहाई देते हुए टाल देते हैं। जैसे कि इसी चर्चा मे जब गाँधी के नेहरू को प्रधानमंत्री घोषित करने कि बात उठी तो आपने यह दलील दी कि- “जब गाँधी ने अपना एक सफल कारोबार छोड़ कर धोती पहन ली,तब तो बहुत ताली बजा रहे थे,जब गाँधी के सामने चार्ली चैपलिन झुक जाता था तब तो बहुत ताली बजा रहे थे” आदि आदि।
यदि ऐसे ही प्रश्न जनता आपसे करने लगे कि “जब सड़कों पर लोकपाल बिल का आंदोलन करने सब दोस्त निकले थे तब तो समर्थन मे बहुत भाषण दे रहे थे, जब वो बाकी राजनीतिक पार्टियों के बड़े नेताओं के खिलाफ बोल रहे थे तब तो खूब बढ़ चढ़ के समर्थन दे रहे थे और जब वो आंदोलन से पलटकर राजनीति मे आ गए तो आपके बुरे हो गए!” ऐसा क्यों भला?
चलिये इसका भी उत्तर मैं आप ही के कहे कथन से दे देता हूँ- आपने इसी चर्चा मे पहले कहा था कि आपने आम आदमी पार्टी को इसलिए छोड़ दिया क्योकि उसके शीर्ष पर बैठे नेता जनता मे उन्ही के द्वारा जगाई गयी आशा और कायम किये गए विश्वास की हत्या कर रहे थे। ठीक उसी प्रकार नेहरू को प्रधानमंत्री घोषित करते समय “हमारे देश कि मुसलमान जनता नेहरू को पसंद करती है इसलिए उसे बनाया” ऐसा कहने से स्वतन्त्रता संग्राम मे गाँधी से आस लगाए बैठे उन करोड़ों हिंदुओं के विश्वास की हत्या हुई होगी क्या आपको ऐसे नहीं लगता? पत्रकार दुर्गादास की किताब “India from Curzon to Nehru and after” मे गांधी का यह बयान छपा हुआ है चाहे तो आप स्वयं पढ़ सकते है। खिलाफत आंदोलन से सब के अंदर “हिन्दू मुसलमान भाई भाई” की भावना को जाग्रत करने वाले गाँधी के इस और इसके बाद के और भी बहुत सारे कदम ऐसे थे जिनहोने गाँधी पर हिंदुओं के उस विश्वास की बार बार हत्या की। आपने इनमे से नोआखली की बात की तो उसी घटना की बात कर लेते हैं। एक मेयर के पूरे परिवार की हत्या के बाद उसका जबरन धर्मांतरण करवाकर उसकी ही बहन से निकाह पढ़वाने के बाद 5 दिन तक कड़ी निगरानी मे बीफ खिलाया गया। और जब इसके विरोध मे हिंदुओं ने शस्त्र उठा लिए तो अगले ही दिन गांधी वहाँ पर पहुँच गए और हिंदुओं से शस्त्र रख देने की प्रार्थना की। यही प्रार्थना उन्होने मुसलमानों से क्यों नहीं की?
नोआखली मे मरते हिंदुओं के बीच वो व्यक्ति ब्रम्ह्चर्य के प्रयोग कर रहा था जिसकी साक्षी उनकी स्वयं की आत्मकथा है। आपने सिर्फ इतना बताया की नेहरू भी नौ साल जेल मे रहे और सावरकर जी भी जेल मे रहे लेकिन यह नहीं बताया की नेहरू को जेल के अंदर किन विभिन्न प्रकार की सुविधाए प्राप्त हो रही थी और सावरकर जी को कोल्हू का बैल बना दिया गया था। यदि आप एक निडर वक्ता होने का दावा करते हैं तो कृपया इन विषयों पर भी निडरता से बोले और कुल के सबसे छोटे होने की आडंबरयुक्त दुशाला को न ओढ़ें।
यदि आपको समय के प्रतिबिंब मे स्वयं को मिले घाव याद हैं तो हमें भी उसी समय के प्रतिबिंब मे गाँधी ,नेहरू और काँग्रेस पार्टी द्वारा दिये गए चोट के निशान आज भी दिखते है और स्मरण भी आते है। हम तो ऐसे ही विदुर की भांति अपने पूर्वजों द्वारा किए गए हर अधर्म के विरुद्ध बोलते रहेंगे और आशा है की आप भी कभी निडरता के साथ इन सब विषयों पर चर्चा करेगे।